Thursday, April 20, 2017
Tuesday, April 18, 2017
Bhagwat Katha - तृतीय दिवस - महामंडलेश्वर हरिओदासजी महाराज
जीवन के हर क्षण में बना रहे भगवान का स्मरण
घाटोल
तपोभूमि लालीवाव मठ पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर हरिओमदास महाराज ने कहा कि पूर्व काल में जो कुछ भी किया है, उसका फल इस युग में जरूर मिलता है। इसलिए मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसके कर्म की ही पूजा होती है। वे सरस्वती विद्या मंदिर घाटोल में चल रही सात दिवसीय भागवत कथा के तीसरे दिन श्रद्धालुओं को प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि इच्छा शक्ति ज्ञानशक्ति को मजबूत बनाना जरूरी है। व्यक्ति को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहकर सही रूप से निर्वहन करना चाहिए। व्यक्ति का पहला शत्रु अज्ञानता है और पहला गुरु उसकी मां ही होती है। कथा के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
ध्यान से रुकेगा मन का भटकाव: कथाचार्यमहंत हरिओमदास महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा के मर्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ईश्वर में ध्यान लगाकर मन के भटकाव को रोका जा सकता है। यह तभी संभव होगा, जब मनुष्य भक्ति में लीन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि ईश्वर का अपने हृदय में निवास स्थिर करने के लिए ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करना जरूरी है। भूतकाल को भूलकर वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए, सृष्टि में बदलाव लाना चाहिए-जैसा भाव होगा वैसी दृष्टि बनेगी, ब्रह्म दृष्टि बनने पर सभी में ईश्वर दिखता है। भगवान से हमें मुक्ति का पद मांगना चाहिए। संसार में सभी जीव परमात्मा के अंश हैं। सभी में परमात्मा को देखने वाला विद्वान होता है। जिसकी दृष्टि में शुद्धता नहीं होती है वह इस संसार में पूजा नहीं जाता है अर्थात् शुद्धता से ही सबका प्रिय बना जा सकता है। मनुष्य की सभी वासनाएं परिपूर्ण नहीं होती हैं। भगवान को प्राप्त होने से प्राणी तृप्त हो जाता है।
प्रत्येकक्षण में ईश्वर का करें स्मरण: अश्वत्थामाकी कथा का उद्धरण देते हुए महाराजश्री ने कहा कि पांडवों के पुत्रों का वध तक कर देने वाले अश्वत्थामा को द्रौपदी ने ब्राह्मण पुत्र एवं गुरु पुत्र हो जाने से क्षमा कर दिया और दया को अपनाया, इसलिए भगवान की वह कृपा पात्र बनी रही।
उन्होंने कहा कि जीवन के प्रत्येक क्षण में भगवान का स्मरण बना रहना चाहिए, तभी जीवनयात्रा की सफलता संभव है। दुःखों में ही भगवान को याद करने और सुखों में भूल जाने की प्रवृत्ति ही वह कारक है, जिसकी वजह से आत्मीय आनंद छीन जाता है। कुंती ने इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण से मांगा कि जीवन में सदैव दुःख ही दुःख मिले, ताकि भगवान का स्मरण दिन-रात बना रहे। महंतश्री ने कहा कि 'पापियों के संग मुफ्त में खाने-पीने से लेकर सारी सुविधाएं तक अच्छी लगती हैं, लेकिन जीवन के लक्ष्य से मनुष्य भटक जाता है और यह विवेक तब जगता है जब संसार से विदा होने का समय आता है। इसलिए अभी से सचेत हो जाओ और दुष्टों-पापियों से दूर रहकर अच्छे काम करो, ईश्वर का चिंतन करो।'
मुस्कान का भी दान दीजिए : दानकई तरह के होते हैं। अभयदान और ज्ञानदान की तरह मुस्कान दान भी देना चाहिए। इसका अच्छा असर यह होता है कि सामने से भी मुस्कान मिलेगी। इसी तरह, बढ़िया वातावरण बनाने का दान भी करना चाहिए। अपनों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसका बीज कांटे लेकर आता है। उन्होंने नीति को जीवन में जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि बिना नीति घर-व्यापार, राज कुछ नहीं चलता। नीति से जीवन जीने पर तो अधिक धन भी नहीं चाहिए।
कथामें गौसंत रघुवीरदास महाराज का भी सानिध्य रहा
इसके साथ ध्रुव चरित्र पृथु चरित्र, जड़ भरत चरित्र अजामिल उपाख्यान, प्रहलाद चरित्र, नृसिंह अवतार आदि प्रसंग सुनाए गए। इसके साथ ही शाम 4 बजे भगवान को भोग एवं उसके बाद भागवत की आरती उतारी गई एवं प्रसाद वितरण किया गया।
घाटोल
तपोभूमि लालीवाव मठ पीठाधीश्वर महामंडलेश्वर हरिओमदास महाराज ने कहा कि पूर्व काल में जो कुछ भी किया है, उसका फल इस युग में जरूर मिलता है। इसलिए मनुष्य जो भी कर्म करता है, उसके कर्म की ही पूजा होती है। वे सरस्वती विद्या मंदिर घाटोल में चल रही सात दिवसीय भागवत कथा के तीसरे दिन श्रद्धालुओं को प्रवचन दे रहे थे। उन्होंने कहा कि इच्छा शक्ति ज्ञानशक्ति को मजबूत बनाना जरूरी है। व्यक्ति को अपने अधिकारों के प्रति सजग रहकर सही रूप से निर्वहन करना चाहिए। व्यक्ति का पहला शत्रु अज्ञानता है और पहला गुरु उसकी मां ही होती है। कथा के दौरान श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी।
ध्यान से रुकेगा मन का भटकाव: कथाचार्यमहंत हरिओमदास महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा के मर्म पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि ईश्वर में ध्यान लगाकर मन के भटकाव को रोका जा सकता है। यह तभी संभव होगा, जब मनुष्य भक्ति में लीन हो जाएगा। उन्होंने कहा कि ईश्वर का अपने हृदय में निवास स्थिर करने के लिए ईश्वरीय गुणों को आत्मसात करना जरूरी है। भूतकाल को भूलकर वर्तमान पर ध्यान देना चाहिए, सृष्टि में बदलाव लाना चाहिए-जैसा भाव होगा वैसी दृष्टि बनेगी, ब्रह्म दृष्टि बनने पर सभी में ईश्वर दिखता है। भगवान से हमें मुक्ति का पद मांगना चाहिए। संसार में सभी जीव परमात्मा के अंश हैं। सभी में परमात्मा को देखने वाला विद्वान होता है। जिसकी दृष्टि में शुद्धता नहीं होती है वह इस संसार में पूजा नहीं जाता है अर्थात् शुद्धता से ही सबका प्रिय बना जा सकता है। मनुष्य की सभी वासनाएं परिपूर्ण नहीं होती हैं। भगवान को प्राप्त होने से प्राणी तृप्त हो जाता है।
प्रत्येकक्षण में ईश्वर का करें स्मरण: अश्वत्थामाकी कथा का उद्धरण देते हुए महाराजश्री ने कहा कि पांडवों के पुत्रों का वध तक कर देने वाले अश्वत्थामा को द्रौपदी ने ब्राह्मण पुत्र एवं गुरु पुत्र हो जाने से क्षमा कर दिया और दया को अपनाया, इसलिए भगवान की वह कृपा पात्र बनी रही।
उन्होंने कहा कि जीवन के प्रत्येक क्षण में भगवान का स्मरण बना रहना चाहिए, तभी जीवनयात्रा की सफलता संभव है। दुःखों में ही भगवान को याद करने और सुखों में भूल जाने की प्रवृत्ति ही वह कारक है, जिसकी वजह से आत्मीय आनंद छीन जाता है। कुंती ने इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण से मांगा कि जीवन में सदैव दुःख ही दुःख मिले, ताकि भगवान का स्मरण दिन-रात बना रहे। महंतश्री ने कहा कि 'पापियों के संग मुफ्त में खाने-पीने से लेकर सारी सुविधाएं तक अच्छी लगती हैं, लेकिन जीवन के लक्ष्य से मनुष्य भटक जाता है और यह विवेक तब जगता है जब संसार से विदा होने का समय आता है। इसलिए अभी से सचेत हो जाओ और दुष्टों-पापियों से दूर रहकर अच्छे काम करो, ईश्वर का चिंतन करो।'
मुस्कान का भी दान दीजिए : दानकई तरह के होते हैं। अभयदान और ज्ञानदान की तरह मुस्कान दान भी देना चाहिए। इसका अच्छा असर यह होता है कि सामने से भी मुस्कान मिलेगी। इसी तरह, बढ़िया वातावरण बनाने का दान भी करना चाहिए। अपनों का कभी अपमान नहीं करना चाहिए, क्योंकि इसका बीज कांटे लेकर आता है। उन्होंने नीति को जीवन में जरूरी बताया। उन्होंने कहा कि बिना नीति घर-व्यापार, राज कुछ नहीं चलता। नीति से जीवन जीने पर तो अधिक धन भी नहीं चाहिए।
कथामें गौसंत रघुवीरदास महाराज का भी सानिध्य रहा
इसके साथ ध्रुव चरित्र पृथु चरित्र, जड़ भरत चरित्र अजामिल उपाख्यान, प्रहलाद चरित्र, नृसिंह अवतार आदि प्रसंग सुनाए गए। इसके साथ ही शाम 4 बजे भगवान को भोग एवं उसके बाद भागवत की आरती उतारी गई एवं प्रसाद वितरण किया गया।
Monday, April 17, 2017
Bhagwat Katha - हरिओदासजी महाराज
चिंता छोड़, चिंतन करें - हरिओमशरणदासजी
उदाजी का गढ़ा घाटोल में चल रही सात दिवसीय भागवत कथा के दूसरे दिन महाराज ने प्रवचन दिए
उदाजी का गढ़ा घाटोल में चल रही सात दिवसीय भागवत कथा के दूसरे दिन महाराज ने प्रवचन दिए
घाटोल/खमेरा
सरस्वती विद्या मंदिर उदाजी का गढ़ा में चल रही सात दिवसीय भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक लालीवाव मठ के हरिओमशरणदास महाराज ने आचरण और सत्य भाषण पर जोर दिया। महाराज ने कहा कि भागवत प्राप्ति का नहीं अपितु प्रेम का साधन है, जब तक प्रेम नहीं होगा, अनुरक्ति प्राप्त नहीं होगी, अतः हमें कृष्ण से प्रेम करना होगा।
श्रीमद् भगवत मृत्यु से नहीं अपितु मृत्यु के भय से बचाती है। जो होना है वो होगा ही, तो चिंता क्यों? चिंता चिता दोनों सगी बहने हैं, जहां चिता मरने के बाद जलाती है, वहीं चिंता जीते जी मनुष्य को जलाती है। अतः चिंता छोड़े और चिन्तन करें। कथा पांडाल में शिव पार्वती के विवाह की झांकी आकर्षण का केंद्र रही।भागवत कथा सुनने मात्र से ही कट जाते हैं पाप, लेकिन कथा सुनने में तीन बाधाएं व्यवधान उत्पन्न करते हैं। इनमें नींद वाणी और पैर शामिल हैं। जो भक्त इन बाधाओं से मुक्त होकर भागवत कथा का श्रवण करते हैं, उनका कष्ट, दुख, दारिद्रय, व्याधि सहित जीवन की अन्य समस्याएं नष्ट हो जाती हैं।
कलयुग में काम-क्रोध
महाराज ने कहा कि कलयुग के लोगों को काम-क्रोध की अग्नि में जलते देखकर कृष्ण ने लोगों के उद्धार के लिए शुक को भेजा। उन्होंने शुक से कहा कि कलयुगवासियों को हमारी लीलाओं का भजन कर उनका कल्याण करो। कलयुग में भगवान का नाम जपने से ही कल्याण संभव है। कहा जाता है कि 13 करोड़ मंत्र जप करने पर भगवान दर्शन का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
पार्वतीसो गई और शुक ने सुनी कथा
महाराज ने कहा कि एक बार पार्वतीजी ने भोलेनाथ से गुप्त अमर कथा सुनाने की जिद की। शिवजी ने आस-पास देखकर निश्चित होने के लिए कहा कि कोई और तो नहीं सुन रहा है। पार्वती जी ने आस-पास देखकर शिवजी को आश्वस्त कर दिया कि कोई नहीं है, लेकिन वहां शुक जी मौजूद थे। शिवजी पार्वती को कथा सुनाने लगे। कथा सुनते-सुनते पार्वतीजी को नींद गई। उनके सोने पर वहां मौजूद शुक जी हुंकार भरने लगे। पार्वतीजी की जब नींद टूटी तो उन्होंने शिवजी को नींद आने की बात बताई। भगवान ने अपनी अंतरदृष्टि से देखकर शुक जी की उपस्थिति का पता लगा लिया। उन्होंने शुकजी का वध करने के लिए त्रिशुल उठाया। शुकजी भागकर व्यासजी की पत्नी के गर्भ में छिप गए। शिवजी वध के लिए 12 वर्ष तक उनके गर्भ से निकलने का इंतजार करते रहे। बाद में व्यासजी ने शिवजी को शुकजी को क्षमा करने के लिए मना लिया। इसके साथ राजा परीक्षित को श्राप, सृष्टि निर्माण, शिव पार्वती का पुनः विवाह प्रसंग सुनाए गए। शाम 4 बजे भगवानजी को भोग लगाया और आरती उतारी।
सरस्वती विद्या मंदिर उदाजी का गढ़ा में चल रही सात दिवसीय भागवत कथा के दूसरे दिन कथावाचक लालीवाव मठ के हरिओमशरणदास महाराज ने आचरण और सत्य भाषण पर जोर दिया। महाराज ने कहा कि भागवत प्राप्ति का नहीं अपितु प्रेम का साधन है, जब तक प्रेम नहीं होगा, अनुरक्ति प्राप्त नहीं होगी, अतः हमें कृष्ण से प्रेम करना होगा।
श्रीमद् भगवत मृत्यु से नहीं अपितु मृत्यु के भय से बचाती है। जो होना है वो होगा ही, तो चिंता क्यों? चिंता चिता दोनों सगी बहने हैं, जहां चिता मरने के बाद जलाती है, वहीं चिंता जीते जी मनुष्य को जलाती है। अतः चिंता छोड़े और चिन्तन करें। कथा पांडाल में शिव पार्वती के विवाह की झांकी आकर्षण का केंद्र रही।भागवत कथा सुनने मात्र से ही कट जाते हैं पाप, लेकिन कथा सुनने में तीन बाधाएं व्यवधान उत्पन्न करते हैं। इनमें नींद वाणी और पैर शामिल हैं। जो भक्त इन बाधाओं से मुक्त होकर भागवत कथा का श्रवण करते हैं, उनका कष्ट, दुख, दारिद्रय, व्याधि सहित जीवन की अन्य समस्याएं नष्ट हो जाती हैं।
कलयुग में काम-क्रोध
महाराज ने कहा कि कलयुग के लोगों को काम-क्रोध की अग्नि में जलते देखकर कृष्ण ने लोगों के उद्धार के लिए शुक को भेजा। उन्होंने शुक से कहा कि कलयुगवासियों को हमारी लीलाओं का भजन कर उनका कल्याण करो। कलयुग में भगवान का नाम जपने से ही कल्याण संभव है। कहा जाता है कि 13 करोड़ मंत्र जप करने पर भगवान दर्शन का अधिकार प्राप्त हो जाता है।
पार्वतीसो गई और शुक ने सुनी कथा
महाराज ने कहा कि एक बार पार्वतीजी ने भोलेनाथ से गुप्त अमर कथा सुनाने की जिद की। शिवजी ने आस-पास देखकर निश्चित होने के लिए कहा कि कोई और तो नहीं सुन रहा है। पार्वती जी ने आस-पास देखकर शिवजी को आश्वस्त कर दिया कि कोई नहीं है, लेकिन वहां शुक जी मौजूद थे। शिवजी पार्वती को कथा सुनाने लगे। कथा सुनते-सुनते पार्वतीजी को नींद गई। उनके सोने पर वहां मौजूद शुक जी हुंकार भरने लगे। पार्वतीजी की जब नींद टूटी तो उन्होंने शिवजी को नींद आने की बात बताई। भगवान ने अपनी अंतरदृष्टि से देखकर शुक जी की उपस्थिति का पता लगा लिया। उन्होंने शुकजी का वध करने के लिए त्रिशुल उठाया। शुकजी भागकर व्यासजी की पत्नी के गर्भ में छिप गए। शिवजी वध के लिए 12 वर्ष तक उनके गर्भ से निकलने का इंतजार करते रहे। बाद में व्यासजी ने शिवजी को शुकजी को क्षमा करने के लिए मना लिया। इसके साथ राजा परीक्षित को श्राप, सृष्टि निर्माण, शिव पार्वती का पुनः विवाह प्रसंग सुनाए गए। शाम 4 बजे भगवानजी को भोग लगाया और आरती उतारी।
Wednesday, July 20, 2016
Govardhan Parvat Krishna at Tapobhumi Laliwav math
लालीवाव मठ में चल रही भागवत कथा के तहत हजारों भक्त प्रतिदिन यहां आ रहे हैं । इसके तहत भगवान पद्मनाभ के गोवर्धन की श्रृंगारित प्रतिमा में बरसात और बिजली की आवाज ने भक्तों को काफी आकर्षित किया हर कोई देखकर भाव विभोर हो जाता है ।
Govardhan Parvat Krishna
Govardhan Parvat Krishna
Tuesday, July 19, 2016
Gurupurnima Mahotsav 2016, लालीवाव मठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव धूमधाम से मना
लालीवाव मठ में गुरुपूर्णिमा महोत्सव धूमधाम से मना,
दिन भर लगा रहा भक्तों का तांता
बांसवाड़ा,, गुरु पूर्णिमा महोत्सव ऐतिहासिक लालीवाव मठ में मंगलवार को धूमधाम से मनाया गया। भोर में गुरु पादुका पूजन अनुष्ठान हुआ। इसमें लालीवाव पीठाधीश्वर महंत हरिओमशरणदास महाराज ने मठ के पूर्ववर्ती महंतों की छत्री, चरणपादुकाओं तथा मूर्तियों का पूजन किया और आशीर्वाद प्राप्त किया।
महंत नारायणदास महाराज की छतरी पर गुरु पादुकापूजन कार्यक्रम में लालीवाव की शिष्य परम्परा के बड़ी संख्या में अनुयायियों और भक्तों ने हिस्सा लिया और विविध उपचारों के साथ गुरु पूजन किया।
लालीवाव मठ में मंगलवार को दिन भर भारी भीड़ लगी रही। भक्तों ने लालीवाव के महंत हरिओमशरणदास महाराज को पुष्पहार पहनाकर पूजन किया तथा आशीर्वाद प्राप्त किया।
दिन में दीक्षा महोत्सव हुआ। इसमें बड़ी संख्या में नव दीक्षार्थियों ने दीक्षा विधान के साथ लालीवाव महंत से दीक्षा प्राप्त की और नवजीवन का संकल्प ग्रहण किया। तीन घण्टे चले इस दीक्षा महोत्सव में दीक्षार्थियों का तांता बंधा रहा। शिष्यों ने पीठाधीश्वर की आरती उतारी और आशीर्वाद प्राप्त किया।
दिन भर लालीवाव धाम पर भजन-कीर्तनों की धूम बनी रही। लालीवाव धाम के प्रधान मन्दिर पद्मनाथ में भगवान के श्रीविग्रहों का मनोहारी श्रृंगार किया गया। इनमें भगवान पद्मनाभ के गोवर्धननाथ स्वरूप दृश्यों की झांकी को देखने श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहा।
सायंकाल भजन किर्तन, महाआरती एवं भण्डारे के साथ आठ दिवसीय महामहोत्सव का समापन हुआ ।
दिन भर लगा रहा भक्तों का तांता
बांसवाड़ा,, गुरु पूर्णिमा महोत्सव ऐतिहासिक लालीवाव मठ में मंगलवार को धूमधाम से मनाया गया। भोर में गुरु पादुका पूजन अनुष्ठान हुआ। इसमें लालीवाव पीठाधीश्वर महंत हरिओमशरणदास महाराज ने मठ के पूर्ववर्ती महंतों की छत्री, चरणपादुकाओं तथा मूर्तियों का पूजन किया और आशीर्वाद प्राप्त किया।
महंत नारायणदास महाराज की छतरी पर गुरु पादुकापूजन कार्यक्रम में लालीवाव की शिष्य परम्परा के बड़ी संख्या में अनुयायियों और भक्तों ने हिस्सा लिया और विविध उपचारों के साथ गुरु पूजन किया।
लालीवाव मठ में मंगलवार को दिन भर भारी भीड़ लगी रही। भक्तों ने लालीवाव के महंत हरिओमशरणदास महाराज को पुष्पहार पहनाकर पूजन किया तथा आशीर्वाद प्राप्त किया।
दिन में दीक्षा महोत्सव हुआ। इसमें बड़ी संख्या में नव दीक्षार्थियों ने दीक्षा विधान के साथ लालीवाव महंत से दीक्षा प्राप्त की और नवजीवन का संकल्प ग्रहण किया। तीन घण्टे चले इस दीक्षा महोत्सव में दीक्षार्थियों का तांता बंधा रहा। शिष्यों ने पीठाधीश्वर की आरती उतारी और आशीर्वाद प्राप्त किया।
दिन भर लालीवाव धाम पर भजन-कीर्तनों की धूम बनी रही। लालीवाव धाम के प्रधान मन्दिर पद्मनाथ में भगवान के श्रीविग्रहों का मनोहारी श्रृंगार किया गया। इनमें भगवान पद्मनाभ के गोवर्धननाथ स्वरूप दृश्यों की झांकी को देखने श्रद्धालुओं का जमघट लगा रहा।
सायंकाल भजन किर्तन, महाआरती एवं भण्डारे के साथ आठ दिवसीय महामहोत्सव का समापन हुआ ।
राष्ट्रधर्म सर्वोपरि
इस मौके पर शिष्यों को अपने वार्षिक प्रवचन में लालीवाव पीठाधीश्वर महंत हरिओमशरणदास ने कहा कि राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर कार्य करें। समाज-जीवन के जिस किसी भी क्षेत्र में कार्यरत हों वहां देशभक्ति और देश के विकास की भावना को सामने रखकर दिव्य जीवन व्यवहार के साथ कार्य करें और ईश्वर द्वारा प्रदत्त क्षमताओं का भरपूर उपयोग मानवता के हित में और मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति में करें ।
इस मौके पर शिष्यों को अपने वार्षिक प्रवचन में लालीवाव पीठाधीश्वर महंत हरिओमशरणदास ने कहा कि राष्ट्र को सर्वोपरि मानकर कार्य करें। समाज-जीवन के जिस किसी भी क्षेत्र में कार्यरत हों वहां देशभक्ति और देश के विकास की भावना को सामने रखकर दिव्य जीवन व्यवहार के साथ कार्य करें और ईश्वर द्वारा प्रदत्त क्षमताओं का भरपूर उपयोग मानवता के हित में और मनुष्य जीवन के चरम लक्ष्य की प्राप्ति में करें ।
महाभारत, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद् भागवत आदि के रचयिता महापुरुश वेदव्यासजी के ज्ञान का मनुष्यमात्र लाभ ले, इसलिए गुरुपूजन को देवताओं ने वरदानों से सुसज्जित कर दिया कि ‘जो सत्शिष्य सद्गुरु के द्वार जायेगा, उनके उपदेशों के अनुसार चलेगा उसे 12 महीनों के व्रत-उपवास करने का फल इस पूनम के व्रत-उपवास मात्र से हो जायेगा ।’
ब्रह्मवेताओं के हम ऋणी हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तथा उनकी शिक्षाओं का स्मरण करे उन पर चलने की प्रतिज्ञा करने के लिए हम इस पवित्र पर्व ‘गुरुपूर्णिमा’ को मनाते है ।
गुरुपूर्णिमा को हर शिष्य को अपने गुरुदेव के दर्शन करना चाहिए । प्रत्यक्ष दर्शन न कर पाये ंतो गुरुआश्रम में जाकर जप-ध्यान, सत्संग, सेवा का लाभ अवश्य लेना चाहिए । इस दिन मन-ही-मन अपने दिव्य भावों के अनुसार सद्गुरुदेव का मानस पूजन विशेष फलदायी है ।
महंत हरिओमदासजी ने कहा कि महाभारत, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद् भागवत आदि के रचयिता महापुरुश वेदव्यासजी के ज्ञान का मनुष्यमात्र लाभ ले, इसलिए गुरुपूजन को देवताओं ने वरदानों से सुसज्जित कर दिया कि ‘जो सत्शिष्य सद्गुरु के द्वार जायेगा, उनके उपदेशों के अनुसार चलेगा उसे 12 महीनों के व्रत-उपवास करने का फल इस पूनम के व्रत-उपवास मात्र से हो जायेगा । ब्रह्मवेताओं के हम ऋणी हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तथा उनकी शिक्षाओं का स्मरण करे उन पर चलने की प्रतिज्ञा करने के लिए हम इस पवित्र पर्व ‘गुरुपूर्णिमा’ को मनाते है । गुरुपूर्णिमा को हर शिष्य को अपने गुरुदेव के दर्शन करना चाहिए । प्रत्यक्ष दर्षन न कर पाये ंतो गुरुआश्रम में जाकर जप-ध्यान, सत्संग, सेवा का लाभ अवश्य लेना चाहिए । इस दिन मन-ही-मन अपने दिव्य भावों के अनुसार सद्गुरुदेव का मानस पूजन विशेष फलदायी है ।
ब्रह्मवेताओं के हम ऋणी हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तथा उनकी शिक्षाओं का स्मरण करे उन पर चलने की प्रतिज्ञा करने के लिए हम इस पवित्र पर्व ‘गुरुपूर्णिमा’ को मनाते है ।
गुरुपूर्णिमा को हर शिष्य को अपने गुरुदेव के दर्शन करना चाहिए । प्रत्यक्ष दर्शन न कर पाये ंतो गुरुआश्रम में जाकर जप-ध्यान, सत्संग, सेवा का लाभ अवश्य लेना चाहिए । इस दिन मन-ही-मन अपने दिव्य भावों के अनुसार सद्गुरुदेव का मानस पूजन विशेष फलदायी है ।
महंत हरिओमदासजी ने कहा कि महाभारत, ब्रह्मसूत्र, श्रीमद् भागवत आदि के रचयिता महापुरुश वेदव्यासजी के ज्ञान का मनुष्यमात्र लाभ ले, इसलिए गुरुपूजन को देवताओं ने वरदानों से सुसज्जित कर दिया कि ‘जो सत्शिष्य सद्गुरु के द्वार जायेगा, उनके उपदेशों के अनुसार चलेगा उसे 12 महीनों के व्रत-उपवास करने का फल इस पूनम के व्रत-उपवास मात्र से हो जायेगा । ब्रह्मवेताओं के हम ऋणी हैं, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए तथा उनकी शिक्षाओं का स्मरण करे उन पर चलने की प्रतिज्ञा करने के लिए हम इस पवित्र पर्व ‘गुरुपूर्णिमा’ को मनाते है । गुरुपूर्णिमा को हर शिष्य को अपने गुरुदेव के दर्शन करना चाहिए । प्रत्यक्ष दर्षन न कर पाये ंतो गुरुआश्रम में जाकर जप-ध्यान, सत्संग, सेवा का लाभ अवश्य लेना चाहिए । इस दिन मन-ही-मन अपने दिव्य भावों के अनुसार सद्गुरुदेव का मानस पूजन विशेष फलदायी है ।
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